शनिवार, 18 अक्तूबर 2008

मेरे सपनो की उडान

मेरे सपनो की उडान ,
सर पर हो एक अपनी छत
शहर मे हो एक अपना मकान
चार पहियों वाला एक वाहन हो
जिसमे घ्रर से दफ़्तर
दफ़्तर से घर आवागमन हो ।
घर मे एक सुंदर पत्नी हो
दफ़्तर मे एक सुंदर संगिनी हो
बॉस सदा रहे मुझ पर मेहरबान
मेरे सपनो की उडान ।
पत्नी मुझसे कभी न रूठे
संगिनी का साथ भी कभी ना छूटे
हफ़्ते भर हो संगिनी का संग ।
सप्ताहांत मे पत्नी रखे मेरा ध्यान
पत्नी संग छुट्टी मनाउँ
दूर हो एसे हफ़्ते भर की थकान
मेरे सपनो की उडान ।
मुझ संग हो न कोइ अनहोनी
बम भी फटे तो मुझसे दूर
जिंदगी है छोटी ,बडे बडे है अरमान
मेरे सपनो की उडान ।

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