शनिवार, 11 जनवरी 2014

२०१४ के चुनावों की चर्चा - १

आज पूरे दिन मित्रो से चर्चा चल रही थी, चर्चा में मुख्य रुप से तीन प्रश्न उठे थे १) क्या आम आदमी पार्टी के आने से देश को फायदा हुआ है २) क्या कांग्रेस मोदी को सत्ता मे आने से रोकने के लिए आम आदमी पार्टी की दिल्ली सरकार को समर्थन दे रही है ? ३) क्या आम आदमी पार्टी का लोकसभा चुनावो मे उतरने का यह सही समय है ?
इन प्रश्नो का उत्तर खोजते हुए कई विषयो पर बात होती रही । और जब चर्चाए समाप्त हुई तो यही निष्कर्ष निकल कर सामने आया ।
१)आम आदमी पार्टी के उदय से देश की राजनीती में सकारात्मक परिवर्तन आया है । जिस प्रकार नेता जनता को मूर्ख समझकर स्वयं को उनका "हाकिम" समझते थे और केवल वादे करके पाँच वर्षो तक देश को लूटने निकल पडते थे, उनका वो स्वभाव परिवर्तित होने के संकेत है ।दोनो ही प्रमुख राष्ट्रीय पार्टीयो के नेता जनता के सरोकारो और शिकायतो पर बात कर रहे है, बिजली, पानी जैसे मुद्दो पर बहस और चर्चाए हो रही है । मुंबई के तो दो सासंदो ने बिजली बिल कम करने के लिए अपनी ही सरकार के खिलाफ आंदोलन करने की बात की है ।ये माने या ना माने पर नेताओ का यह स्वभाव परिवर्तन निश्चित रुप से "आप" का ही असर है ।  जिस प्रकार रिश्वत लेना सरकारी नौकरो के "काम" का हिस्सा बन चुका है, उस आदत पर भी नकेल कसकर आम आदमी पार्टी की दिल्ली सरकार ने ये दिखला दिया है कि यदि प्रशासन चुस्त हो तो वर्षो पुरानी इस आदत को भी बदला जा सकता है । कुल मिलाकर ये कहा जा सकता है कि आम आदमी पार्टी के आने से देश का फायदा ही हुआ है ।
२) कांग्रेस की अगुवाइवाली "यूपीए" को दिल्ली, राजस्थान,मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ के चुनाव परिणामो से कम से कम यह अंदाजा हो गया है कि वो २०१४ के चुनाव में विजय प्राप्त करने की स्थिती में तो नही है । उनके १० वर्षो के शासनकाल में हुए अनगिनत घोटालो ने देश में कांग्रेसविरोधी लहर का निर्माण कर दिया है । लोग सरकार से त्रस्त है और विकल्प के रुप नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री के रुप में देख रहे है । उपरोक्त परिस्थिती है राष्ट्रीय परिदृश्य में आम आदमी पार्टी की आगमन से पहले की, इस नाटक की तस्वीर तो तब बदल जाती है जब "नायक", महानायक बनने की आस लिए लोकसभा चुनावो में अधिकाधिक सीटों पर चुनाव लडने का निश्चय करता है। अब स्थिती ये है कि शायद मोदी अपने बलबूते २७२ के जादुई आंकडे तक नहीं पहुँच पाएंगे, क्योंकि कांग्रेसविरोधी लहर का फायदा उठाने के लिए आम आदमी पार्टी आ गई है । निश्चित तौर पर आम आदमी पार्टी, बीजेपी और मोदी को नुकसान पहुँचाएगी । इस परिस्थिती को भाँपते हुए कांग्रेस ने सत्ता का लॉलीपॉप आम आदमी पार्टी रुपी नवजात को पकडाने का निश्चय किया ताकि देश के कांग्रेसविरोधी मिजाज पर आम आदमी पार्टी की पकड मजबूत हो । कांग्रेस ये भलिभांति जानती है कि यदि बीजेपी अपने दम पर २७२ सीटें ना जीत पाई तो तथाकथित धर्मनिरपेक्ष पार्टीयाँ जिन्होंने अटल जी की सरकार को समर्थन दिया था, वो मोदी को समर्थन तो कतई नहीं करेंगे, और यदि बीजेपी अपने सबसे लोकप्रिय नेता के नेतृत्व में सरकार नहीं बना पाई तो यह कांग्रेस के लिए जीत ही होगी, इससे ये तो सिद्ध हो जाता है कि कांग्रेस, उस पार्टी को जिसका जन्म ही कांग्रेस का विरोध करके हुआ है, केवल मोदी रथ को रोकने के लिए समर्थन दे रही है और न चाहते हुए भी आम आदमी पार्टी उसके हाथो की कठपुतली बनकर रह गई है ।
३) अब आता है आखरी और सबसे महत्वपूर्ण सवाल क्या आम आदमी पार्टी का लोकसभा चुनावो मे उतरने का यह सही समय है ? इस प्रश्न काफी विचार हुआ और जो बात निकलकर सामने आई है वो निश्चित ही मेरे जैसे अधिकांश केजरीवाल समर्थक भी मानेंगें । ये सत्य है कि आम आदमी पार्टी ने देश के आम आदमी को राजनीती में एक महत्वपूर्ण स्थान देने की कोशिश की है और कुछ हद तक राखी बिड्लान और संजीव झा जैसे लोगो को विधायक बनाकर उस कोशिश को सफल भी बनाया है, ये भी सच है कि दिल्ली में उनकी सफलता के बाद बहुत से लोग उनसे जुड रहे है। किंतु क्या उनसे जुडनेवाले सभी लोग आम आदमी है और उन्होंने अपना जीवन उसी सादगी और देश के प्रति सच्ची निष्ठा रखकर जिया है जैसा की स्वयं अरविंद केजरीवाल ने व्यतीत किया है ? निश्चित रुप से इसका उत्तर नकारात्मक ही होगा क्योंकि केजरीवाल जैसा जीवन जीना हर किसी के बस की बात नहीं । हाँ ये जरुर कहा जा सकता है कि इनमें से अधिकांश लोग, एसे सत्तालोभी व्यक्ति है जो आम आदमी पार्टी रुपी कश्ती पर सवार होकर सत्तारुपी किनारे पर पहुँचना चाहते हैं। सच तो ये है कि यदि आम आदमी पार्टी से अरविंद केजरीवाल को हटा दिया जाए तो इस पार्टी को ढोने की ताकत रखनेवाला कोइ शख्स आम आदमी पार्टी में नही है । राष्ट्रीय हित से जुडे कई मुद्दो पर अभी तक आम आदमी पार्टी का कोई निश्चित पक्ष या एजेंडा नहीं है। कुल मिलाकर केवल मास-अपील वाले मुद्दे उठाकर राष्ट्र की सत्ता हासिल नहीं की जा सकती ये बात आम आदमी पार्टी भी भलिभांति जानती है, फिर केवल जनता के समक्ष एक दिशाहीन विकल्प के रुप में जाने से क्या हासिल कर लेगी आम आदमी पार्टी । हो सकता है कि आम आदमी पार्टी के चुनाव लडने से लोकसभा का हाल भी वैसा ही हो जाए जैसा कि दिल्ली विधानसभा का हुआ था, जहाँ पर कोई भी पार्टी सरकार बनाने की स्थिती में नही थी । बेहतर तो ये होता कि आम आदमी पार्टी पहले लोकसभा चुनावो के साथ होनेवाले विभिन्न राज्यो के विधानसभा चुनावो को लक्ष्य बनाती और उनपर विजय प्राप्त करके सुशासन के साथ राष्ट्र की सत्ता पर काबिज होने के लिए अपने कदम अगले लोकसभा चुनावों में बढाती । अंततः मै यहीं कहना चाहूंगा कि मई २०१४ के पश्चात यदि राष्ट्रपति शासन लगाने या दोबारा चुनाव कराने की नौबत आए अथवा सत्तालोलुप एवं नाकाबिल तीसरे मोर्चे की सरकार बने तो इसका सारा श्रेय आम आदमी पार्टी को ही जाएगा, ये निश्चित है ।

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