गुरुवार, 11 अप्रैल 2019

२०१९ के चुनावो की चर्चा - ०२

आज चुनावो की चर्चा के क्रम इस सरकार द्वारा लिए गए कुछ महत्वपूर्ण निर्णयों और उनके परिणामो की चर्चा करना उचित होगा  :-

१) नोटबंदी :- यह कदम इस सरकार के द्वारा उठाये सबसे अधिक विवादित कदमो में से एक है और इसने देश के लगभग प्रत्येक व्यक्ति को प्रभावित किया है । ये सत्य है की इस कदम से कई लोगो को अत्यधिक परेशानी हुई और कष्ट झेलने पड़े किन्तु , यह भी सत्य है की काला धन रखने वालो के लिए, अपने धन को निकालकर बाँटने/जलाने/बहाने  की नौबत जरूर आई , कई लोगो के वर्षो से अटके हुए, पैसे लोगो ने बुला बुलाकर लौटाए , विशेष रूप से निर्माण क्षेत्र में नोटबंदी  की वजह से लोगो ने अपने काले पैसे को भुनाने के लिए अपने कॉन्ट्रैक्टर्स न केवल एडवांस पेमेंट किया बल्कि उनके रुके हुए पैसे भी लौटा दिए । अमीर लोग काले पैसे से ही अमीर बनते है, समाज में फैली, ये कुछ हद तक सत्य अवधारणा, लोगो में इस कदम का खुल कर विरोध करने का साहस नहीं दे पाती । बेहतर भविष्य के लिए ऐसे कड़े फैसले लेने ही होंगे ये विश्वास दिलाने सरकार सफल हुइ है । यही कारण है की विपक्षी पार्टिया इन मुद्दों पर जोर न देकर केवल राफेल के मुद्दे को हवा दे रही है । सच कहे तो ये मेरा ये मानना है की हाथ पर हाथ धरे बैठे रहनेवाली सरकार से बेहतर है की सरकार फैसले ले , फैसलों का हश्र क्या होगा ये इतिहास तय करेगा किन्तु जैसा चल रहा है वैसा चलने दो ये मानसिकता सरकारों में न हो तो बेहतर ।

२) वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) : इस सरकार द्वारा लिया गया ये सर्वाधिक  महत्वपूर्ण  एवं ऐतिहासिक कदम था । ये सत्य है की हमारे विशाल देश में जटिल टैक्स नियम और राज्यों तथा केंद्र के अलग अलग टैक्स व्यवस्थाएं औद्योगीकरण में बाधक रहे है । सारे राज्यों को साथ लेकर उनकी सहमति से नयी व्यवस्था लागू कर पाना इस सरकार की उपलब्धि ही कहलाएगी । ये भी सही है की व्यवस्था में इतने बड़े बदलाव को लागू करने में इतने विशाल देश में कुछ समस्याएं आएँगी ही किन्तु सरकार ने समय समय पर कॉउन्सिल की बैठक करके एवं आवश्यक ऐसे बदलाव करके , आनेवाली समस्याओ को कम करने का प्रयास किया । क्या जीएसटी की वजह से छोटे व्यापारियों का नुक्सान हुआ है ? यह सवाल मैंने अनेक न्यूज़ चैनलो पर सुना, इसके अलग अलग जवाब भी सुने,  किन्तु यदि प्रैक्टिकल अपने अनुभव के आधार पर कहू तो मुझे ऐसा नहीं लगता , लोग जीएसटी क्रेडिट लेने के लिए अब अपने बिलो का भुगतान समय पर करने लगे है , कुछ पूर्णतया नगद आधारित छोटे उद्योग जरूर प्रभावित हुए है किन्तु वे भी व्यवस्था के तहत आकर पुनः अपना काम कर सकते है । ये सही है की जब व्यवस्थाओ में बदलाव होते है तो जमीनी स्तर पर समस्याएं उत्पन्न होती है किन्तु ऐसे समय में ये महत्वपूर्ण है की क्या बदलाव लम्बे समय में सकारात्मक होंगे , यदि इस प्रश्न का उत्तर आपके लिए भी हां है, तो आप सरकार के इस कदम की आलोचना नहीं कर सकते ।

शनिवार, 6 अप्रैल 2019

२०१९ के चुनावो की चर्चा - ०१


लोकतंत्र का सबसे बड़ा त्यौहार आने वाला है , अगले पांच वर्षो के लिए अपने नीति निर्धारकों का चयन करने का समय गया है विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र के ये चुनाव लगभग अगले दो महीने तक केवल हमारे देश, बल्कि लगभग सम्पूर्ण विश्व के लिए चर्चा का विषय रहेंगे वोट डालने से पहले ये उचित है की सरकार के काम की परख करने के पश्चात ही वोट डाले आइये मै अपनी निजी राय अपने अनुभव के आधार पर आप सब के समक्ष रखता हूँ
                        
                        शुरुवात एक ऐसे क्षेत्र के बारे में जिससे मेरा प्रतिदिन आमना सामना होता है, लगभग तीन  दशकों से मै उत्तर मुंबई लोकसभा क्षेत्र का निवासी हूँ ,  और १९९६ से यहाँ की लोकल ट्रेनों में सफर कर रहा हूँ , ये सच है की निम्न मध्यमवर्गीय आबादी के लिए लोकल ट्रेन एक समस्या रही है और उसकी सुविधाओं में बढ़ोतरी लगभग सभी सरकारों ने की है, किन्तु पिछले पांच वर्षो में लोकल ट्रेन से सम्बंधित कार्यो की गति दर्शनीय रही है, चाहे नए एस्कलेटर रहे हो या ओवरब्रिज , इनके निर्माण में तेजी आयी और इसके परिणाम स्वरुप यात्रा सुखद हुई है , फिर भी इस दिशा में सदैव प्रयत्नशील रहने की आवश्यकता है और निश्चित ही आनेवाली कोई भी सरकार इसी गति से कार्य जारी रखेगी ये मुझे पूर्ण विश्वास है आश्चर्य तो मुझे हमारे बिहार के जहा वर्षो पहले घोषित प्रोजेक्ट और कार्य धरातल पर दिखाई देने लगे , वैसे अधिकारियो की लापरवाही की वजह से ही ये प्रोजेक्ट लटके पड़े थे किन्तु ये भी सच है की अधिकारियो की लगाम सरकार के ही हाथ में होती है और उनसे कैसे काम लिया जाये ये भी उनकी इच्छाशक्ति पर निर्भर करता है महानगरों में रहनेवाला हर व्यक्ति ये मानेगा की रेलवे के कार्यो को गति मिली है , क्योंकि वर्षो से वह इसका इस्तेमाल कर रहा है और अपनी आँखों से अनुभव कर रहा है ।रेल यात्रा हम जैसे निम्न मध्यमवर्गीय लोगो के जीवन का एक अहम् हिस्सा है , चाहे लोकल ट्रेन में दैनिक सफर हो या मुलुक जाने के लिए लम्बा सफर , यह अपेक्षाकृत तेजी से सुखद ही हुआ है । फिर भी त्यौहार और छुट्टियों में गाँव जाने के लिए मारामारी रहती है और इस दिशा में और काम करने की आवश्यकता है , किन्तु ये निरंतर चलनेवाली प्रक्रिया है और इसमें कोई रुकावट न आये ये सुनिश्चित करना सरकार का काम है और कम से कम इस ओर सरकार के कदम सराहनीय रहे है और इसके परिणाम धरातल पर दिखाई भी दिए है । और यदि कोई ये कहता है की ऐसा नहीं है तो उसने रेलवे में वर्षो सफर नहीं किया होगा ।
अन्य मुद्दों पर चर्चा अगले पोस्ट में………

शनिवार, 11 जनवरी 2014

२०१४ के चुनावों की चर्चा - १

आज पूरे दिन मित्रो से चर्चा चल रही थी, चर्चा में मुख्य रुप से तीन प्रश्न उठे थे १) क्या आम आदमी पार्टी के आने से देश को फायदा हुआ है २) क्या कांग्रेस मोदी को सत्ता मे आने से रोकने के लिए आम आदमी पार्टी की दिल्ली सरकार को समर्थन दे रही है ? ३) क्या आम आदमी पार्टी का लोकसभा चुनावो मे उतरने का यह सही समय है ?
इन प्रश्नो का उत्तर खोजते हुए कई विषयो पर बात होती रही । और जब चर्चाए समाप्त हुई तो यही निष्कर्ष निकल कर सामने आया ।
१)आम आदमी पार्टी के उदय से देश की राजनीती में सकारात्मक परिवर्तन आया है । जिस प्रकार नेता जनता को मूर्ख समझकर स्वयं को उनका "हाकिम" समझते थे और केवल वादे करके पाँच वर्षो तक देश को लूटने निकल पडते थे, उनका वो स्वभाव परिवर्तित होने के संकेत है ।दोनो ही प्रमुख राष्ट्रीय पार्टीयो के नेता जनता के सरोकारो और शिकायतो पर बात कर रहे है, बिजली, पानी जैसे मुद्दो पर बहस और चर्चाए हो रही है । मुंबई के तो दो सासंदो ने बिजली बिल कम करने के लिए अपनी ही सरकार के खिलाफ आंदोलन करने की बात की है ।ये माने या ना माने पर नेताओ का यह स्वभाव परिवर्तन निश्चित रुप से "आप" का ही असर है ।  जिस प्रकार रिश्वत लेना सरकारी नौकरो के "काम" का हिस्सा बन चुका है, उस आदत पर भी नकेल कसकर आम आदमी पार्टी की दिल्ली सरकार ने ये दिखला दिया है कि यदि प्रशासन चुस्त हो तो वर्षो पुरानी इस आदत को भी बदला जा सकता है । कुल मिलाकर ये कहा जा सकता है कि आम आदमी पार्टी के आने से देश का फायदा ही हुआ है ।
२) कांग्रेस की अगुवाइवाली "यूपीए" को दिल्ली, राजस्थान,मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ के चुनाव परिणामो से कम से कम यह अंदाजा हो गया है कि वो २०१४ के चुनाव में विजय प्राप्त करने की स्थिती में तो नही है । उनके १० वर्षो के शासनकाल में हुए अनगिनत घोटालो ने देश में कांग्रेसविरोधी लहर का निर्माण कर दिया है । लोग सरकार से त्रस्त है और विकल्प के रुप नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री के रुप में देख रहे है । उपरोक्त परिस्थिती है राष्ट्रीय परिदृश्य में आम आदमी पार्टी की आगमन से पहले की, इस नाटक की तस्वीर तो तब बदल जाती है जब "नायक", महानायक बनने की आस लिए लोकसभा चुनावो में अधिकाधिक सीटों पर चुनाव लडने का निश्चय करता है। अब स्थिती ये है कि शायद मोदी अपने बलबूते २७२ के जादुई आंकडे तक नहीं पहुँच पाएंगे, क्योंकि कांग्रेसविरोधी लहर का फायदा उठाने के लिए आम आदमी पार्टी आ गई है । निश्चित तौर पर आम आदमी पार्टी, बीजेपी और मोदी को नुकसान पहुँचाएगी । इस परिस्थिती को भाँपते हुए कांग्रेस ने सत्ता का लॉलीपॉप आम आदमी पार्टी रुपी नवजात को पकडाने का निश्चय किया ताकि देश के कांग्रेसविरोधी मिजाज पर आम आदमी पार्टी की पकड मजबूत हो । कांग्रेस ये भलिभांति जानती है कि यदि बीजेपी अपने दम पर २७२ सीटें ना जीत पाई तो तथाकथित धर्मनिरपेक्ष पार्टीयाँ जिन्होंने अटल जी की सरकार को समर्थन दिया था, वो मोदी को समर्थन तो कतई नहीं करेंगे, और यदि बीजेपी अपने सबसे लोकप्रिय नेता के नेतृत्व में सरकार नहीं बना पाई तो यह कांग्रेस के लिए जीत ही होगी, इससे ये तो सिद्ध हो जाता है कि कांग्रेस, उस पार्टी को जिसका जन्म ही कांग्रेस का विरोध करके हुआ है, केवल मोदी रथ को रोकने के लिए समर्थन दे रही है और न चाहते हुए भी आम आदमी पार्टी उसके हाथो की कठपुतली बनकर रह गई है ।
३) अब आता है आखरी और सबसे महत्वपूर्ण सवाल क्या आम आदमी पार्टी का लोकसभा चुनावो मे उतरने का यह सही समय है ? इस प्रश्न काफी विचार हुआ और जो बात निकलकर सामने आई है वो निश्चित ही मेरे जैसे अधिकांश केजरीवाल समर्थक भी मानेंगें । ये सत्य है कि आम आदमी पार्टी ने देश के आम आदमी को राजनीती में एक महत्वपूर्ण स्थान देने की कोशिश की है और कुछ हद तक राखी बिड्लान और संजीव झा जैसे लोगो को विधायक बनाकर उस कोशिश को सफल भी बनाया है, ये भी सच है कि दिल्ली में उनकी सफलता के बाद बहुत से लोग उनसे जुड रहे है। किंतु क्या उनसे जुडनेवाले सभी लोग आम आदमी है और उन्होंने अपना जीवन उसी सादगी और देश के प्रति सच्ची निष्ठा रखकर जिया है जैसा की स्वयं अरविंद केजरीवाल ने व्यतीत किया है ? निश्चित रुप से इसका उत्तर नकारात्मक ही होगा क्योंकि केजरीवाल जैसा जीवन जीना हर किसी के बस की बात नहीं । हाँ ये जरुर कहा जा सकता है कि इनमें से अधिकांश लोग, एसे सत्तालोभी व्यक्ति है जो आम आदमी पार्टी रुपी कश्ती पर सवार होकर सत्तारुपी किनारे पर पहुँचना चाहते हैं। सच तो ये है कि यदि आम आदमी पार्टी से अरविंद केजरीवाल को हटा दिया जाए तो इस पार्टी को ढोने की ताकत रखनेवाला कोइ शख्स आम आदमी पार्टी में नही है । राष्ट्रीय हित से जुडे कई मुद्दो पर अभी तक आम आदमी पार्टी का कोई निश्चित पक्ष या एजेंडा नहीं है। कुल मिलाकर केवल मास-अपील वाले मुद्दे उठाकर राष्ट्र की सत्ता हासिल नहीं की जा सकती ये बात आम आदमी पार्टी भी भलिभांति जानती है, फिर केवल जनता के समक्ष एक दिशाहीन विकल्प के रुप में जाने से क्या हासिल कर लेगी आम आदमी पार्टी । हो सकता है कि आम आदमी पार्टी के चुनाव लडने से लोकसभा का हाल भी वैसा ही हो जाए जैसा कि दिल्ली विधानसभा का हुआ था, जहाँ पर कोई भी पार्टी सरकार बनाने की स्थिती में नही थी । बेहतर तो ये होता कि आम आदमी पार्टी पहले लोकसभा चुनावो के साथ होनेवाले विभिन्न राज्यो के विधानसभा चुनावो को लक्ष्य बनाती और उनपर विजय प्राप्त करके सुशासन के साथ राष्ट्र की सत्ता पर काबिज होने के लिए अपने कदम अगले लोकसभा चुनावों में बढाती । अंततः मै यहीं कहना चाहूंगा कि मई २०१४ के पश्चात यदि राष्ट्रपति शासन लगाने या दोबारा चुनाव कराने की नौबत आए अथवा सत्तालोलुप एवं नाकाबिल तीसरे मोर्चे की सरकार बने तो इसका सारा श्रेय आम आदमी पार्टी को ही जाएगा, ये निश्चित है ।

सोमवार, 30 दिसंबर 2013

२०१३- अंतिम इच्छा

२०१३ अपनी आखरी साँसे गिन रहा है,
सोच रहा है, कैसे बीत गए मेरे जीवन के ये ३६५ दिन,
अभी तो मैं जन्मा था, अभी अतीतरुपी काल मेरे प्राण हरने चला आया,
अपने जीवन को पीछे मुडकर देखा तो सोच में पड गया,
कितनी बाते कितनी यादे कुछ खट्टी, कुछ मीठी बातें,
हुआ दुखी मन जब मेरे कुछ सपूतो का सिर काट ले गया दुश्मन,
है गर्व मुझे कि मेंरे जीवन में ही हुआ महाकुंभ का आयोजन,
जिसे करोडो भगवान कहते थे उसने अपना यज्ञ समाप्त किया
मेरे ही जीवनकाल में,
आम आदमी भी उठ खडा हुआ शासक बना इस साल में ।
मैं तो जा रहा हूँ पर अपने प्राणॊ की आहुति से, उम्मीद का एक नव दीप जला रहा हूँ,
ये भविष्य को रोशन करेगा, तुम्हारे जीवन को हर्ष से भरेगा,
यही है मेरी अंतिम इच्छा ।

बुधवार, 25 दिसंबर 2013

कोना बढत मैथिली

जीवन के २८ मे स २२ वर्ष मुंबई शहर मे गुजरि गेल किंतु आसपास मैथिल समाज भेला के वजह स मैथिली बाज आ समझ के सामर्थ्य भेल । सतत फेसबुक पर मैथिली भाषा के प्रचार आ प्रसार कर लेल विभिन्न संस्था द्वारा जे प्रयास भ रहल अछि से देख क प्रसन्न्ता होयत अछि । एहि पवित्र कार्य मे अपन तुच्छ योगदान के रुप में आब स किछु पोस्ट अपन ब्लॉग पर मैथिली भाषा मे सेहो लिखनाय शुरु क रहल छी कियैक त अपन मातृभाषा के लेल जे भ सकत से करनाय हम अपन कर्तव्य बुझय छी । किंतु सतत हमरा इ चिंता होयत रहय जे नव पीढी मैथिली स दूर जा रहल अछि। जखन अपन मैथिल समाज के विभिन्न शहर में रहवाला ५ स २० वर्ष के आयुवाला नेना-भुटका/युवा सब स भेट होइया त ओइमे स अधिकांश केवल मैथिली सुनि क बुझ जैत छथि किंतु बाजि नै पाबय छथि ।इ सत्य अछि और एकर कारण त हमरा याह बुझैत अछि जे जखन बच्चा अंग्रेजी मे "जॉनी-जॉनी" सुनबैत अछि त पालक प्रसन्न भ जैत छथि किंतु बच्चा सबके अपन मातृभाषा के सिखाब के कोनो प्रयास नै करैत छथि तखन कोना मैथिली भाषा अक्षुण्ण रहत ? कि मैथिली केवल दरभंगा - मधुबनी में रहवाला लोके तक सीमीत रहि जेते  मुंबई,दिल्ली,कोलकाता, हैदराबाद आ बंगलुरु में रहवाला मैथिल नेना-भुटका/युवा मैथिली बिसरि जेता ? प्रश्न गंभीर आ विचारणीय छै । हम चूंकि मुंबई में रहलो त हमरा मराठी त बड नीक बाज आबयाय, कारण समाज मराठी छल, लेकिन आसपास मैथिली समाज सेहो छल, यदि संभवतः  इ नै रहैत त शायद मैथिली बाज नै आबैत । अतः इ स्पष्ट छै जे समाज भाषा के प्रचार के लेल एगो महत्वपूर्ण कारक अछि । सामाजिक कार्यक्रम चाहे ओ सार्वजनिक होइ जेना कि अष्टजाम,सामूहिक पूजा,साहित्यिक कार्यक्रम,कवि सम्मेलन या निजी कार्यक्रम आदि में नेना-भुटका/युवा के सहभागिता सदैव कम रहय छै ।कारण माता-पिता अपन बालक-बालिका के एहन कोनो आयोजन मे ल जेनाय कष्टप्रद बुझैत छथि, और अहिके लेल पूर्ण रुप स जिम्मेदार छथि । एहन सामाजिक कार्यक्रम में यदि नेना-भुटका/युवा सहभागी हेता और अनेक लोक के अपन भाषा बाजैत सुनथिन त निश्चित रुप स अपन भाषा में हुनकर रुचि बढतैन ।इ त हम एकटा उदाहरण देलौ है, एहिना यदि प्रत्येक माय-बाप केवल अपना बालक-बालिका के अपन मातृभाषा सिखा देता ताहि स भाषा प्रचलित आ बढैत रहत ।

शुक्रवार, 6 दिसंबर 2013

लडकपन के दिन

घर की खिडकी से देखा जब,
नन्हे-मुन्हों को खेलते हुए,
ना जाने मन क्यूं चला गया,
पुरानी यादो के साए में.
वो लडकपन के दिन,खेलना मजे से, वो रहना बेपरवाह,
ना चिंता थी कल की, ना कल का था बोझ,
जीते थे आज में, बस उसी क्षण में, करते थे मौज ।

वो मस्ती के दिन,वो माँ को सताना,
क्रिकेट के आगे सब भूल जाना, क्या खाना क्या पीना,
वक्त पर घर ना आना, वो माँ की डाँट,दुलार,प्यार,
वो डर पापा की फटकार का , मार का,
बचने के लिए जिससे सो जाना जल्दी रोज ,
जीते थे आज में बस,उसी क्षण में, करते थे मौज ।

चाहकर भी ना आएंगे फिर लौटकर,
जीवन के हमारे वो स्वर्णिम क्षण,
वो पवित्र समर्पण, वो निष्पाप मन,
ना आशा किसी से, ना ही कोई स्वार्थ,
करते थे वही,उतना ही,जितनी थी समझ,
जीते थे आज में,बस उसी क्षण में, करते थे मौज ।

गुरुवार, 28 नवंबर 2013

आधुनिकता या विचारशून्यता

बहुचर्चित दोहरे हत्याकांड केस मे इसी सप्ताह फैसला आया, और समाज कि दिशा बदलनेवाले इस एतिहासिक फैसले को सुनकर मेरे मन मे कई प्रश्न उठे,विचारो का द्वंद्व हुआ तो मैने इस विषय पर लिखने का निश्चय किया ।आधुनिकता की ओर तेजी से बढ रहे इस समाज की जडे क्या इतनी खोखली हो गई है कि युगो से चले आ रहे पारस्परिक प्रेम से भरे संबंधो मे अविश्वास और शून्यता आ गई है,कम से कम इस निर्णय से तो यही मालूम होता है । कभी-कभी तो एसा प्रतीत होता है कि इस आधुनिक समाज मे हर कोई यथार्थ से मुख मोडे हुए है, और यही कटु यथार्थ जब अचानक सम्मुख आ जाता है तो वो उसे पचा नही पाता । जिन रिश्तो मे सर्वथा ही प्रेम,स्नेह, और ममता का भाव होता था, वे इस आधुनिकता की चकाचौंध मे अपनी निःस्वार्थ चमक खो बैठे है ।
न्यूज चैनलो पर इस केस का पोस्टमॉर्टम देखकर कूतूहलवश मैने सम्मानीय जज द्वारा दिए गए पूरे २२० पन्ने का निर्णय पढ डाला ।
निर्णय पढने के बाद यह प्रतीत हुआ कि सम्मानीय न्यायाधीश ने इस बात को मान लिया है कि परिस्थितिया इस बात कि ओर संकेत करती है कि हत्या घर की चारदीवारी मे स्थित लोगो के अलावा अन्य कोई कर ही नही सकता । सत्य क्या है, और उस दिन क्या हुआ, ये शायद कोइ नही जानता और न ही जान पाएगा । किंतु मन तो अभी-भी यही चाहता है कि यह सत्य न हो, क्योंकि यदि सम्मानीय न्यायाधीश का  ये निर्णय सत्य है तो ये निश्चित ही यह हमारे समाज के लिए खतरे की घंटी है ।

FIGHT OF COVID - VIEW FROM A COMMONER

THE SITUATION IS GRIM AND A VIRUS HAS TAKEN US ALL INTO A SITUATION THAT WE ALL WANT TO GET OUT OF, BUT ARE ANXIOUS, RELUCTANT AND UNABLE ...