घर की खिडकी से देखा जब,
नन्हे-मुन्हों को खेलते हुए,
ना जाने मन क्यूं चला गया,
पुरानी यादो के साए में.
वो लडकपन के दिन,खेलना मजे से, वो रहना बेपरवाह,
ना चिंता थी कल की, ना कल का था बोझ,
जीते थे आज में, बस उसी क्षण में, करते थे मौज ।
वो मस्ती के दिन,वो माँ को सताना,
क्रिकेट के आगे सब भूल जाना, क्या खाना क्या पीना,
वक्त पर घर ना आना, वो माँ की डाँट,दुलार,प्यार,
वो डर पापा की फटकार का , मार का,
बचने के लिए जिससे सो जाना जल्दी रोज ,
जीते थे आज में बस,उसी क्षण में, करते थे मौज ।
चाहकर भी ना आएंगे फिर लौटकर,
जीवन के हमारे वो स्वर्णिम क्षण,
वो पवित्र समर्पण, वो निष्पाप मन,
ना आशा किसी से, ना ही कोई स्वार्थ,
करते थे वही,उतना ही,जितनी थी समझ,
जीते थे आज में,बस उसी क्षण में, करते थे मौज ।
शुक्रवार, 6 दिसंबर 2013
गुरुवार, 28 नवंबर 2013
आधुनिकता या विचारशून्यता
बहुचर्चित दोहरे हत्याकांड केस मे इसी सप्ताह फैसला आया, और समाज कि दिशा बदलनेवाले इस एतिहासिक फैसले को सुनकर मेरे मन मे कई प्रश्न उठे,विचारो का द्वंद्व हुआ तो मैने इस विषय पर लिखने का निश्चय किया ।आधुनिकता की ओर तेजी से बढ रहे इस समाज की जडे क्या इतनी खोखली हो गई है कि युगो से चले आ रहे पारस्परिक प्रेम से भरे संबंधो मे अविश्वास और शून्यता आ गई है,कम से कम इस निर्णय से तो यही मालूम होता है । कभी-कभी तो एसा प्रतीत होता है कि इस आधुनिक समाज मे हर कोई यथार्थ से मुख मोडे हुए है, और यही कटु यथार्थ जब अचानक सम्मुख आ जाता है तो वो उसे पचा नही पाता । जिन रिश्तो मे सर्वथा ही प्रेम,स्नेह, और ममता का भाव होता था, वे इस आधुनिकता की चकाचौंध मे अपनी निःस्वार्थ चमक खो बैठे है ।
न्यूज चैनलो पर इस केस का पोस्टमॉर्टम देखकर कूतूहलवश मैने सम्मानीय जज द्वारा दिए गए पूरे २२० पन्ने का निर्णय पढ डाला ।
निर्णय पढने के बाद यह प्रतीत हुआ कि सम्मानीय न्यायाधीश ने इस बात को मान लिया है कि परिस्थितिया इस बात कि ओर संकेत करती है कि हत्या घर की चारदीवारी मे स्थित लोगो के अलावा अन्य कोई कर ही नही सकता । सत्य क्या है, और उस दिन क्या हुआ, ये शायद कोइ नही जानता और न ही जान पाएगा । किंतु मन तो अभी-भी यही चाहता है कि यह सत्य न हो, क्योंकि यदि सम्मानीय न्यायाधीश का ये निर्णय सत्य है तो ये निश्चित ही यह हमारे समाज के लिए खतरे की घंटी है ।
न्यूज चैनलो पर इस केस का पोस्टमॉर्टम देखकर कूतूहलवश मैने सम्मानीय जज द्वारा दिए गए पूरे २२० पन्ने का निर्णय पढ डाला ।
निर्णय पढने के बाद यह प्रतीत हुआ कि सम्मानीय न्यायाधीश ने इस बात को मान लिया है कि परिस्थितिया इस बात कि ओर संकेत करती है कि हत्या घर की चारदीवारी मे स्थित लोगो के अलावा अन्य कोई कर ही नही सकता । सत्य क्या है, और उस दिन क्या हुआ, ये शायद कोइ नही जानता और न ही जान पाएगा । किंतु मन तो अभी-भी यही चाहता है कि यह सत्य न हो, क्योंकि यदि सम्मानीय न्यायाधीश का ये निर्णय सत्य है तो ये निश्चित ही यह हमारे समाज के लिए खतरे की घंटी है ।
गुरुवार, 24 अक्टूबर 2013
बोरिवली (पूर्व) मे महायज्ञ का आयोजन
मित्रो आप सभी को ज्ञात होगा कि पिछले चार वर्षो से मै एक धार्मिक यात्रा परिवार से जुडा हुआ हूँ । इस यात्रा का नेतृत्व करने वाले श्री मनोज चतुर्वेदी और उनके सहयोगियो ने यात्रा आरंभ करते समय यह निश्चय किया था कि संपूर्ण भारत देश मे स्थित ज्योतिर्लिंगो एवं चारो धामो की यात्रा करने तक यह यात्रा अनवरत चलती रहेगी, और जनवरी २०१३ मे भगवान श्री जगन्नाथ की यात्रा के पश्चात इस निश्चय और संकल्प की पूर्णाहुति हूई । मित्रो, इश्वर के आशीर्वाद का ही परिणाम है कि लगभग दस वर्षो से चल रही इस यात्रा मे समस्याए तो कई आई, किंतु उनका समाधान भी अपने आप ही निकल गया और पूरी यात्रा बिना किसी अप्रिय घटना के संपन्न हुई । इस यात्रा के निहित संकल्प के समापन पर समस्त यात्रा परिवार के प्रयत्न से "आधार फाउंडेशन" के बैनर तले महायज्ञ का आयोजन किया जा रहा है । यह महायज्ञ बोरिवली (पूर्व) स्थित हेमराज हाइस्कूल के प्रांगण मे ५ से ९ नवंबर के बीच संपन्न होगा । इस पोस्ट को पढनेवाले सभी व्यक्ति यदि संभव हो तो कम से कम एक बार इस यज्ञ मे सम्मिलित होकर लाभ ले यही निवेदन है ।
बुधवार, 25 सितंबर 2013
ढलता सूरज धीरे-धीरे ढलता है, ढल जाएगा
दशा और परिस्थिती कभी एक समान नही रहते और राजनीती मे तो प्रतिक्षण इनमे बदलाव होते रहते है । जिस व्यक्ति ने एक वक्त सारे लोगॊ के विरोध को सहकर आपका सर्मथन किया था आज उसी की जगह लेते हुए ना जाने नरेन्द्र मोदी क्या अनुभव कर रहे होंगे । जैसे ही राजनाथ सिंह ने मोदी जी को प्रधानमंत्री पद का दावेदार घोषित किया तो मानो जैसे भारतीय राजनीती मे एक युग का अंत हो गया। वो युग जिसकी शुरुआत तो रथयात्रा से हुइ थी किंतु, अंत रूठने, अकेले ही अपनी आवाज बुलंद करने और अंततः बहुमत के आगे झुकने से हुआ । जिस तरह से शुरुआत नाटकीय थी, अंत भी कम नाटकीय नही था ।भीष्म की तरह सबसे वरिष्ठ होते हुए भी कुछ भी न बदल ना पाना और असहाय सा महसूस करना, ये एक अति नाटकीय परिस्थिती ही तो थी । ना जाने इस निर्णय का हमारे देश के भविष्य पर क्या परिणाम होगा किंतु एक बात तो तय है कि देश के राजनीतीक मंच की एक पीढी का अंत हो चुका है और अगली पीढी इसे आगे ले जाने के लिए अपनी जगह ले चुका है । किसी ने ठीक ही तो कहा है "ढलता सूरज धीरे-धीरे ढलता है, ढल जाएगा" |
गुरुवार, 15 अगस्त 2013
एक बार फिर रामभरोसे
कई दिनो के बाद जब एक बार फिर लिखने का मन हुआ तो सोचा कि क्यो न आज पंद्रह अगस्त के खास दिन ही इस सिलसिले को एक बार फिर शुरु किया जाए । माहौल चुनावी है और अगले साल ही आम चुनाव होने वाले है । नेता अपने दावे प्रस्तुत करने मे लगे है । किंतु हमारे देश की विडंबना ये है कि दो सबसे बडी राष्ट्रीय पार्टीयो का हाल एकदम उल्टा है । जहाँ एक पार्टी मे चाटुकार अपने युवराज को बिना उसकी इच्छा के ही अपना नेता बता रहे है वही दूसरी बडी पार्टी के एक नेता स्वंय को ही एक मात्र विकल्प के रुप मे प्रस्तुत कर रहे है । दोनो पार्टीयो मे परिस्थिती एकदम उल्टी है किंतु दोनो ही ओर के लोगो का मकसद एक ही है । येण केण प्रकारेण सत्ता प्राप्त करना, एक ओर जहाँ लोग चाटुकारिता कर सत्ता के केंद्र मे रहना चाहते है तो दूसरी ओर के नेता स्वंय को ही सत्ता के केंद्र मे देखना चाहते है, हालांकि वे सीधे तौर पर एसा कहने से बच रहे है । स्थानीय राजनीतीक पार्टीयो के नेताओ का अवसरवाद साफ तौर पर उनके निर्णयों मे झलक रहा है । राष्ट्रीय हितो से अधिक उन्हे अपनी स्थानीय वोट बैंको की अधिक परवाह है और उनका विरोध अथवा समर्थन रचनात्मक कम और निजी स्वार्थपरक अधिक प्रतीत होता है । इस प्रकार के माहौल मे एसा प्रतीत होता है कि हमारे देश का हाल तो अब इश्वर के हाथो मे ही है ।
बुधवार, 28 मार्च 2012
वापसी की पोस्ट - फिल्मे
पिछले हफ्ते मैंने दो सस्पेंस थ्रिलर फिल्मे देखी एक बहुत ज्यादा अच्छी और दूसरी उतनी ही ज्यादा बेतुकी !मैं उन फिल्मो का नाम नहीं लूँगा किन्तु आप खुद ही समझ जायेंगे | एक सुलझे हुए किरदारों से भरी हुई दूसरी ऐसी जिसमे कुछ किरदारों को ही नहीं पता चला होगा की वे फिल्म में क्या कर रहे हैं | एक में मुख्य किरदार नायिका तो दुसरे में नायक | एक फिल्म देखने के बाद ऐसा महसूस हुआ की पैसे वसूल हो गए तो दूसरी फिल्म देखने के बाद एसा लगा की ये फिल्म देखी ही क्यों |दोनों ही फिल्मे एक ही विधा की थी किन्तु दोनो में जमीन - आसमान कर फर्क नजर आया | उम्मीद है दूसरी फिल्म के प्रोडूसर को अकल आ जाये और वो अपनी इस फिल्म के सिक्वल में वो गलतियाँ ना दोहराये जो उन्होंने इस फिल्म में की हैं |
बुधवार, 24 अगस्त 2011
धार्मिक यात्रा - 2011
पिछले वर्ष की तरह इस वर्ष भी मुझे उत्तर भारतीय संघ की शाखा बोरीवली के बैनर तले और श्री मनोज चतुर्वेदी के नेतृत्व में आयोजित धार्मिक यात्रा में सहभागी होने का अवसर मिला इस बार की यात्रा अत्यंत ही रोचक और भाग दौड़ से भरी हुई थी, इश्वर ने कई स्थानों पर हमारी कठिन परीक्षा भी ली | किन्तु उनके ही आशीर्वाद से हम यात्रा में पूर्व निर्धारित सभी स्थानों पर गए और यात्रा पूरी की | यात्रा के बारे में और जानकारी अगले पोस्ट में | यात्रा की फोटोस के लिए यहाँ क्लिक करे |
सदस्यता लें
संदेश (Atom)
-
पन्द्रह अगस्त की इस भोर में ब्लॉग लिखते हुए आजादी का एहसास और अभिनव बिंद्रा द्वारा जीते गए पहले व्यक्तिगत स्वर्ण पदक की खुशी दोनों ही अपने च...
-
"लाहौर" - एक अच्छी और सच्ची फिल्म "खेल सिर्फ खेल हैं और उसमे हार-जीत का महत्व सिर्फ हार और जीत से हैं, नकि मुल्क कि प्रतिष्ठा...
-
किसी कारणवश मै दो दिन के लिये इलाहाबाद प्रवास पर गया था । जिस स्थान पर मै ठहरा था वह सन्गम के अत्यन्त निकट और गन्गातट के ठिक सामने स्थित था,...
FIGHT OF COVID - VIEW FROM A COMMONER
THE SITUATION IS GRIM AND A VIRUS HAS TAKEN US ALL INTO A SITUATION THAT WE ALL WANT TO GET OUT OF, BUT ARE ANXIOUS, RELUCTANT AND UNABLE ...
