गुरुवार, 1 अप्रैल 2010

रियल लाइफ की "वीर-जारा"

सानिया और शोएब ने शादी करने का फैसला किया है, ये वही शोएब है जिन्हें उनके देश के क्रिकेट बोर्ड ने टीम की हार का जिम्मेदार मानते हुए है एक साल के लिए बैन कर दिया है और ये वही सानिया है जो पिछले कुछ दिनों से अपनी सफलता के लिए कम और अपनी असफलताओ और ग्लैमर के लिए ज्यादा चर्चित रही है सेलेब्रिटीज के पल-पल की खबर रखने वाली मीडिया को भी इस क्रोस बोर्डर प्यार की भनक तक नहीं लगी ये आश्चर्य की बात है, किन्तु इससे ये भी साबित होता है की ये कितने सफल और पेशेवर खिलाडी है और अपना मन जिस खेल में लगाते हैं उसे बड़ी सफाई से खेलते हैं चूँकि इनका ध्यान अपने "प्यार" के खेल में लगा हुआ था इसलिए क्रिकेट और टेनिस के मैदान पर ये अपने जलवे कैसे दिखा पाते शोएब तो अपने खेल में इस लगन से खेले कि उनके देश के बोर्ड ने उन्हें पुरस्कारस्वरूप एक साल के लिए इस खेल को खेलने की पूरी आजादी दे दी और सानिया भी अपने फेवरेट देश ऑस्ट्रेलिया में कुछ ख़ास कमाल नहीं दिखा पाई, और इस खेल में मग्न होकर जब अपने भविष्य के गृहशहर में टेनिस खेलने गयी तो चोट खा बैठी, दिल पर चोट तो लगी ही थी अब शारीर भी चोटिल हो गया चोटिल होकर आप टेनिस तो नहीं खेल सकते किन्तु "प्यार" के खेल को खेलने के लिए तो ऐसी बंदिश नहीं हैं अपनी शादी की घोषणा करने के लिए जब उन्होंने ने प्रेस को बुलाया तो उनसे पुछा गया की भारत-पाक के मैच में वो किसे सपोर्ट करेंगी तो उन्होंने कहा की मैं अपने पति और अपने देश दोनों को सपोर्ट करूंगी, सही भी है पाकिस्तान और उसकी क्रिकेट टीम के हालात ऐसे है की वहा पर कोई देश की टीम नहीं मानो ग्यारह अलग-अलग लोग खेल रहे हो तो पाकिस्तान देश को सपोर्ट करने जैसी बात तो आती ही नहीं सही मायनो में ये जोड़ी हैं रियल लाइफ की "वीर-जारा"

गुरुवार, 25 मार्च 2010

"लाहौर" - एक अच्छी और सच्ची फिल्म

"लाहौर" - एक अच्छी और सच्ची फिल्म
"खेल सिर्फ खेल हैं और उसमे हार-जीत का महत्व सिर्फ हार और जीत से हैं, नकि मुल्क कि प्रतिष्ठा और सम्मान से" यही सन्देश देती हैं फिल्म "लाहौर" दो भाइयों कि कहानी और भारत पाक रिश्तो को किक-बोक्सिंग के खेल के साथ जोड़ कर "लाहौर" फिल्म का ताना बाना बुना गया है वीरेन्द्र सिंह (अनहद) और धीरेन्द्र सिंह (सुशांत सिंह ) दो भाइयों के किरदार में हैं बड़ा भाई धीरेन्द्र जहाँ एक सफल किक-बोक्सर हैं वही छोटा भाई वीरेन्द्र एक उभरता हुआ क्रिकेटर हैं
एशियन चैम्पियनशिप में फ़ाइनल मुकाबले जब धीरेन्द्र का मुकाबला पाकिस्तानी मुक्केबाज नूर मोहम्मद(मुकेश ऋषि) से होता हैं, तो अंको के आधार पर लगभग पराजित हो चुके नूर अपने कोच (सब्यास्ची चक्रवर्ती) के बहकावे में आकर धीरेन्द्र पर पीछे से ऐसा वार करता हैं कि उसकी मौत हो जाती हैं
बड़े भाई कि मौत से पहले ही आहत छोटे भाई वीरेन्द्र को जब ये पता चलता हैं कि दोनों देशो के राजनितिक दबाव के चलते उसके भाई कि मौत को एक दुर्घटना करार दे दिया गया हैं तो वह अपने क्रिकेट कैर्रिएर को दाव पर लगा कर अपने भाई के सपने को साकार करने और उसका पक्ष रखने के लिए किसी भी हद तक जाने के लिए तैयार हो जाता है और पाकिस्तान के लाहौर में होने वाले गुडविल बोक्सिंग मुकाबले में भाग लेने के लिए कोच एस के राव (फारुक शेख) से गुजारिश करता है इसके बाद फिल्म के जबरदस्त क्लाइमैक्स में क्या होता हैं ये जानने के लिए ये फिल्म देखना ही उचित होगा फिल्म में बोक्सिंग के दृश्य काफी सटीक है और कुछेक हिस्सों को छोड़ दिया जाये तो बाकी समय फिल्म दर्शक को बाँध कर रख पाने में सफल होती हैं कोच की भूमिका में फारुक शेख जबरदस्त छाप छोड़ते हैं, खासकर हैदराबादी लहजे में कहे गए उनके संवाद काफी प्रभावित करते है पाकिस्तानी मनोचिकित्सक की भूमिका में श्रद्धा दास (इदा), वीरेन्द्र और धीरेन्द्र की माँ के किरदार में नफीसा अली (अम्मा) और धीरेन्द्र की प्रेमिका की भूमिका में श्रद्धा निगम (नीला) के पास ज्यादा समय नहीं है फिर भी ये अपने किरदारों के साथ न्याय कर पाने में सफल होती है सुशांत सिंह हमेशा की तरह अपने काम में प्रभावशाली है लेकिन किन्तु अनुभव की कमी आनहद के काम में साफ़ झलकती हैं ख़ास कर भावात्मक दृश्यों में वे अपना प्रभाव नहीं छोड़ पाते कुल मिलाकर यह फिल्म दर्शको को निराश नहीं करेगी किन्तु सिनेमाघरों में कम शो होने, युवाओ में अति चर्चित फिल्म "लव, सेक्स और धोखा" के साथ रिलीज़ और "IPL” की वजह से शायद ज्यादा लोग ये फिल्म नहीं देख पाएंगे

शुक्रवार, 9 अक्टूबर 2009

कॉमनवेल्थ खेल - खेल या पिकनिक

कॉमनवेल्थ खेलो के आयोजन से हमें क्या हासिल होगा , ये तो अभी भविष्य के गर्भ में छुपा हुआ है क्या समय पर इसकी तैयारिया पूरी हो पाएँगी या एक हिन्दुस्तानी शादी की तरह आखरी वक़्त तक जैसे तैसे हम इसे पूरा कर लेंगे और क्या हम इनके जैसे तैसे आयोजन करके ओलंपिक खेलो के लिए अपनी दावेदारी मजबूत कर पाएँगे या ये सिर्फ़ कलमाडी जैसे चतुर नेताओ के लिए निजी लाभ कमाने का जरिया ही बनेगा मीडिया में इस वक़्त ये जोरदार चर्चा का विषय बना हुआ हैं किन्तु ज्यादा सोचने से पहले हमें कॉमनवेल्थ खेलो के एतिहासिक महत्व और विश्व-स्तरीय खेल प्रतियोगिताओ पर इसके परिणामो का असर आदि के बारे में जान लेना चाहिए कई आलोचक इन खेलो को पुराने मालिक और गुलामो की पिकनिक का नाम देते है जब १९३० में पहली बार इन खेलो का आयोजन कनाडा में हुआ था तो उस वक़्त इसे ब्रिटिश एम्पायर गेम्स के नाम से जाना गया,कॉमनवेल्थ यह नाम तो १९७८ में दिया गया , यहाँ एम्पायर का अर्थ तत्कालीन ब्रिटेन के औपनिवेशिक देशो से था, जिन्हें स्वंतंत्रता मिनले के बाद कॉमनवेल्थ कहा गया इन खेलो को आयोजित करने का मकसद यही था जिन देशो में ब्रिटेन ने शासन किया हैं वहा के लोगो को सांस्कृतिक और खेलो में भी ब्रितानी मूल्य थोपे जाए इस खेल के सभी नियम और परम्पराए ब्रिटेन से जुडी हुई है वैसे जब ये खेल शुरू हुए थे तो इसमें केवल ११ देशो ने हिस्सा लिया था जो की अब बढ़कर ७१ हो गयी है अब इन खेलो के परिणामो की ओलंपिक में प्रवेश के मानदंड की बात करे तो पता चलता है की सभी महाद्वीपों के कई श्रेष्ठ देशो के खिलाडियों की उपस्थिति के बावजूद इन खेलो में स्वर्ण पदक जीत कर भी ओलंपिक प्रवेश पक्का नहीं होता उदहारण के लिए हॉकी में यदि एशियन गेम्स और पण अमेरिकन गेम्स के विजेता ओलंपिक के लिए सीधे प्रवेश कर जाते हैं वही कॉमनवेल्थ खेलो में स्वर्ण जीत कर भी एसा नहीं होता

गुरुवार, 1 अक्टूबर 2009

महाराष्ट्र की महाभारत

इन दिनों महाराष्ट्र के विधानसभा चुनावो की सरगर्मी सारी मुंबई पर छाई हुई है, और मनसे एवं शिवसेना के राज और उद्धव जो चचेरे भाई है, एक अलग तरह के कलयुगी महाभारत को मूर्त रूप दे रहे है यह महाभारत महाराष्ट्र की सत्तारुपी इन्द्रप्रस्थ को पाने के लिए है, और इसके केन्द्र में है महाराष्ट्र का मराठी समाज, जो इस असमंजस में है की इन दोनों विकल्पों में किसे चुना जाए वैसे तो ये महाभारत मनसे के जन्म से ही शुरू हो गई थी किंतु इसमे पिछले दिनों नया मोड़ तब आया जब अब तक भीस्म पितामह बने बाळ ठाकरे जो की राज ठाकरे पर सीधे हमले से बच रहे थे, ने एकाएक पार्टी मुखपत्र सामना में लिखा की राज ठाकरे मराठी समाज को टुकडो में बाँट रहे है, और इसके लिए उन्होंने उनकी तुलना जिन्ना से की हैं। अब देखना ये है की राज ठाकरे जो कि बाळ ठाकरे पर सीधे प्रहार से बचते रहे है उनके इस वार का जवाब किस प्रकार देते हैं ।

शनिवार, 7 मार्च 2009

INDIA WORKS,PEOPLE MAKE IT WORK

काफी दिनो से कुछ लिख नही पाया शायद व्यस्तता की वजह से और शायद विषयाभाव के चलते भी । पिछले दिनो काम के सिलसिले मे चेन्नई जाना हुआ । रेलगाडी देश के दक्षिणी छोर की ओर बढ रही थी, शायद आंध्र और तमिलनाडु की सीमा पर ।भाषा की दिक्कत आ रही थी । कुछ एसे लोग भी साथ सफर कर रहे थे जो न ही हिंदी जानते थे और न ही अंग्रेजी, किंतु उनसे इशारो मे ही सही बात हो रही थी । पर तभी मेरी नजर एक सरदार जी पर पडी, मैने उनसे हिंदी मे बात करनी चाही किंतु वे हिंदी केवल समझ पा रहे थे और उनके जवाब अंग्रेजी मे ही दे रहे थे, हाँ उनकी तमिल बडी प्रभावशाली थी ।दूसरा वाक्या, जब काम खत्म करके तीन दिनो बाद लौट रहा था तो रात्रि के भोजन के लिये चेन्नई सेंट्र्ल पहुँच कर एक होटल की तलाश करने लगा । तलाश इसलिए क्योकि तीन दिनो तक अपने स्थानीय सहकर्मियो के साथ केवल चावल और इडली-डोसा खाने के बाद मेरा मन रोटी खाने को कर रहा था । वही पर एक बोर्ड पर नजर पडी जिस पर लिखा था "पंजाबी ढाबा" । मै अपनी रोटी की चाह और भूख शांत करने के लिये इसी होटल मे घुस गया ।अंदर जाने पर पता चला कि होटल एक पंजाबी परिवार चला रहा है । पिता कांउटर पर है तो पुत्र वेटर की भूमिका मे और माँ ने किचन सँभाल रखा है । खान खाते हुए मेरी नजर दिवारो पर पडी जिन पर तमिल फिल्मो के पोस्टर लगे हुए थे जिनमे होटल के मालिक सरदार जी अभिनय या निर्देशन किया था । अपने व्यवसाय की वजह से ये सरदार हिंदी तथा तमिल दोनो ही भाषाए धाराप्रवाह बोल रहे थे । विविधता मे एकता की एसी मिसालो को देखकर ये कथन सत्य लगता है कि " INDIA WORKS ,PEOPLE MAKE IT WORK"

रविवार, 18 जनवरी 2009

बॉलीवुड मसाला , चायनीज तडके के साथ


कल मैने चाँदनी चौक से चाईना देखी ।थियेटर मे दो सौ रुपये का टिकट लेकर के फिल्म देखते हुए एसा लग रहा था मानो कुछ पुरानी फिल्मो के प्लॉटस को उठाकर जोड दिया गया है और उसे फिल्म की शक्ल देकर दिखाया जा रहा है । वही पुरानी बदले पर आधारित, परिवार का बिछडना कुंभ के मेले मे नही, चीन की दीवार पर फिर मिलना,याद्दाश्त का जाना पर फिर पुरानी तस्वीर देखकर उसका वापस आना । दो जुडवा भाई, नही बहने एक सुंदर,चतुर किंतु इमानदार तो दूसरी बेईमान और वांटेड, जो क्लाईमेक्स अपने परिवार से मिलने के बाद बदल जाती है,ये सभी घिसे पिटे प्लॉटस आपको निश्चित तौर पर याद होंगे, ये सारे इस फिल्म का अहम हिस्सा है । इन सबके बीच अक्षय कुमार की कॉमेडी और एक्शन से भरपूर एक्टिंग, अच्छी, किंतु कमजोर स्क्रीनप्ले और नाकाफी से लगने वाले डॉयलॉग्स की वजह से बेअसर सी लगनेवाली ।अन्य कलाकारो मे रणवीर शौरी और मिथुन दा अपने रोल्स को अच्छी तरह से निभा रहे है । दीपीका पादुकोण शोपीस ही है फर्क सिर्फ इतना है कि यहाँ वो जिस्म नही दिखाती बल्कि कुछ अच्छे एक्शन सीन्स मे अपना जलवा दिखाती है । अपने अभिनय के जौहर दिखाने के लिए उनके पास समय ही नही है । ज्यादातर दृश्यो मे वो या तो जासूसी कर रही है दूर खडी होकर अक्षय को देख रही है ।गार्डन लू के पास भी कुछ एक्शन दृश्यो के अलावा कुछ नही है करने को,पर वे अपनी एक छाप इस फिल्मे मे छोड जाते है । दीपीका पादुकोण के पिता के रोल मे जो चायनीज एक्टर है उनका काम भी सराहनीय है । फिल्म की पैकेंजिंग अच्छी है, किंतु उसमे निरंतरता की कमी साफ झलकती है और दर्शक कई बार अनुमान लगा लेता है कि अगले दृश्य मे क्या होगा जिससे उसे बोरियत महसूस होती है । मैने तो अपने पैसे वेस्ट कर लिये अगर आपने भी करना है तो किजिए पर बेहतर यही होगा कि डीवीडी बाजार मे आने का इंतजार करे, और मुझे यकीन है कि ये इंतजार लंबा नही होगा ।

शनिवार, 27 दिसंबर 2008

साल की आखरी पोस्ट

नया वर्ष दरवाजे पर दस्तक दे रहा है , समय है नए साल के लिये अपने लक्ष्य तय करने का, रिजोलूश्यन बनाने का । इस वर्ष फिटनेस पर ध्यान देना है , इस वर्ष सीए क्लियर करना है, जैसे कई विचार मन मे आने लगे है । वैसे नए साल के अपने रिजोलूश्यनस पर हम शायद साल के पहले महीने ही कायम रह पाते आते है और उसके बाद जोश ठंडा पड जाता है । किंतु पिछ्ले महीने के आतंकी हमलो के बाद हमने जिस उत्साह से आतंक का मुकाबला करने की बाते की है उसे आने वाले नए साल मे ले कर चलना अत्यंत आवश्यक है । हर किसी ने नए साल के लिये कुछ न कुछ सोचा होगा या सोच रहे होंगे मैने भी काफी चीजे सोची है जो शायद मै आपसे जो भी मेरे विचारो को पढते है अगले साल के पहले सप्ताह मे शेअर करूँगा । यदि आप कुछ सुझाव देना चाहते है तो जरूर दे ।

FIGHT OF COVID - VIEW FROM A COMMONER

THE SITUATION IS GRIM AND A VIRUS HAS TAKEN US ALL INTO A SITUATION THAT WE ALL WANT TO GET OUT OF, BUT ARE ANXIOUS, RELUCTANT AND UNABLE ...